Ayurvedic Herb Varahi Kand
आयुर्वेद कि प्राचीन संहिता ग्रन्थों में आलुका उल्लेख मिलता है। यह आलु आज के प्रसिध्द शाक द्रव्य आलुु से भिन्न है। परन्तु इस आलु के समान ही कन्द विशेष है। सुश्रुत संहिता में इस आलु के कही भेदों के वर्णन मिलता है। ये आलु के भेद वानस्पती दृष्टि से ही वाराह कुल कि प्रजातियां है। सुश्रुत संहिता भेद है। इसे रक्तालुक भी कहते है। इसकि लता होती है। इस कंद को बाराही कंद के नाम से भी जाना जाता है। इसका आकार वाराह से है और सुअर बड़ेे चाव से खाते है। इसका आकार वाराह के सिर जैसा होता है, और इस बारह जैसे कठोर बाल यानी रोंम पाये जाते है। इसलिए इस वाराही कन्द कहते है। दस वाराही कंद को वैद्य लोंग बल्य मे रुप में देखते है। वाराही कंद का पौधा बेल जैसा होेता है।
वाराही कंद क्या है?
वाराही कंद का फूल-नर पुष्प कि मंजरी 4-से 10 इचं लम्बी होती है। इनमे नरपुष्पों कि मंजरियां के निचे के और झुकी रहती है। इन मंजरियों में छोटे-छोटे पीतवर्ण या श्वेतवर्ण के लगते है। यह शरद ऋतु के अन्त तक विकासित होते है। कही- कही जेष्ठ मांस में भी पुष्प आते है। इन पुष्पों से रात्री अधिक सुगन्ध आती है
वाराही कंद के फायदे
1 पाचन शक्ती को बढा़वा देता है
2 बवासीर,मुळव्याद में लाभकारी
3 किड़नी कि समस्या मे फायदेमंद
4 शरिर कि सुजन कम करने मे लाभकारी
5 कुष्ठ रोग,त्वचा रोग,सफेद दाग मे लाभकरी
6 वाजीकरन,यौंन शक्ती बढ़ाने मे कारगर
7 घुटनों के दर्द मे लाभकारी
वराही कंद से नुकसान
1 वाराही कंद का सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करें 2 वाराही कंद उन व्यक्तीयों के लिए सुरक्षित है जो इसका सेवन चिकित्सक या सम्बधित क्षेत्र के अनुसार करते है
सिताराम सावजी उतेकर
महा आयुर्वेदि जड़बुटी वाराही कंद
मो नं 9833696512
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